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रविवार, अगस्त 05, 2018

मानव जीवन मे जल का महत्व एवं इसकी उपयोगिता

प्रस्तुति - समीर कौशिक व सारॉश शर्मा - क्रमश कक्षा 9 व कक्षा 7 मे छात्र है।


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सम्पूर्ण विश्व मे पृथ्वी पर जहॉ जहॉ मानव जीवन सम्भव है वहॉ जल एवं ऑक्सीजन दोनो ही उपलब्ध है अन्यथा मानव जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है। केवल मानव जीवन ही नही अपितु विश्व के सम्पूर्ण जीवित प्राणियों के लिये जल एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आज इस लेख मे माध्यम से हमने पाठको को जल की महत्ता एवं जल को संरक्षित किये जाने हेतु एक प्रयास किया है। 


पिछले कुछ वर्षो मे किये गये अनुसन्धानों के निष्कर्षो के आधार पर यह बताया गया है कि पृथ्वी पर स्वच्छ जल एवं पीने योग्य जल की मात्रा बहुत कम उपलब्ध है। इस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान मे रखते हुए हमे जल को बरबाद नही करना चाहिये बल्कि भावी पीढीयो के लिये भी इस जल रूपी अमृत को सहेजना व संरक्षित करना चाहिये। जल संरक्षण हेतु हमे स्वयं को भी बदलना होगा तथा अपनी कुछ आदतो को त्यागना भी होगा, साथ ही साथ अन्य लोगो को भी इसके प्रति जागरूक करना होगा। 

पृथ्वी पर जल एक अमूल्य ईश्वरीय निधि है जिसका कोई मूल्य हमे नही चुकाना पड़ता है। इस धरती पर समस्त प्राणियो का जीवन जल की उपस्थिति होने के कारण ही सम्भव हुआ है। जल स्वयं मे गंधहीन, स्वादहीन व रंगहीन एक द्रव्य है परन्तु यह जल ही इस धरती के समस्त प्राणियो के जीवन को स्वाद रंग एवं सुगन्धो से परिपूर्ण करता है। यह कहना गलत नही होगा कि जल ही जीवन का दूसरा नाम है। जल हमें जीवन प्रदान करता है परन्तु बदले मे कुछ भी नही लेता है। यूॅ तो जल हमे नहरो, नदियों, समुद्रो, कुॅओ व तालाबो आदि विभिन्न स्थानो पर मिल जाता है परन्तु फिर भी पीने योग्य स्वच्छ जल की कमी है। जल का अपना कोई स्वरूप नही होता है इसे तो जिस पात्र मे रख दो यह उसका ही स्वरूप ग्रहण कर लेता है। 

पृथ्वी पर जीवित रहने के लिये केवल मानव ही नही अपित पशु व पौधो आदि सभी को जल की परम आवश्यकता होती है। हमे स्नान, कपड़े धोने, पीने, खाना बनाने एवं पौधो को जल देने आदि समस्त कार्यो के लिये इसकी आवश्यकता होती है। 

रहीम ने भी एक दोहे मे माध्यम से जल की महत्ता पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है तथा मानव जीवन को जल से जोड़कर कहा है कि -
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न उबरे, मोती, मानुष, चून।
रहीम ने उपरोक्त दोहे मे पानी के तीन अर्थो का उपयोग किया है। पहला अर्थ मनुष्य के सन्दर्भ मे है रहीम ने कहा है कि मानव को अपने जीवन मे पानी की तरह विनम्रता रखनी चाहिये। पानी का दूसरा अर्थ आभा व चमक से है जिसके बिना मोती जैसे अमूल्य रत्न मे भी आभा व चमक उत्पन्न नही होती तथा उसका मूल्य नही रहता है। तीसरा अर्थ जल के स्वाभाविक मूल्य से है जिसके बिना आटा (चून) का स्वभाव नर्म नही हो सकता तथा मोती का मूल्य उसकी आभा के बिना नही हो सकता उसी प्रकार मनुष्य का भी व्यवहार पानी (विनम्र) होना चाहिये अन्यथा उसका भी मूल्य हमेेशा गिरता है। 

जिस प्रकार रहीम ने उपरोक्त दोहे मे पानी (जल) को ही समस्त के लिये उपयोगी बताने का प्रयास किया है एवं आज के युग मे विज्ञान ने भी यह सिद्व कर दिया है कि जल के बिना जीवन सम्भव नही है। ऐसी स्थितियों मे यह आवश्यक है कि जल का बरबाद होने से रोका जाये एवं जल को संरक्षित किया जाये ताकि आगामी पीढीयो को इस जल रूपी अमृत की अनवरत धारा मिल सके।