रिपोर्ट - मुरादाबाद उत्तर प्रदेश से तहसील प्रभारी सुभाष चंद्र दीक्षित।

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विश्व पर्यावरण दिवस पर देशभर में तमाम जगहों पर बड़े-बड़े शिक्षाविदों और पर्यावरण वैज्ञानिकों द्वारा एसी हॉलों में बैठकर संगोष्ठी और सेमिनार का आयोजन किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत देखने वाला कोई नजर नहीं आया। हम यहां बात कर रहे हैं मुरादाबाद की जीवनदायनी रामगंगा नदी की, जो लंबे समय से अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, लेकिन इसकी सुध किसी ने नहीं ली।
उत्तराखंड के कालागढ़ से लेकर बिजनौर मुरादाबाद रामपुर बरेली और बदाऊं होते हुए रामगंगा फरुखाबाद में जाकर गंगा नदी में मिल जाती है। जबकि आज मुरादाबाद तक पहुंचने में ही रामगंगा हांफने लगती है। मुरादाबाद के रामगंगा नदी में जो थोड़ा पानी बह रहा है वो भी गंदे नालों और फैक्ट्रियों से निकलने वाला पानी है। जिस कारण नदी कि वनस्पति ही नहीं जलीय जीव भी अब नष्ट हो चले हैं, या यूं कह सकते हैं कि बस नाम बाकि है और कुछ नहीं।
रामगंगा नदी को करीब से जाकर देखा तो नदी फूट-फूट कर रोती हुई दिखाई दे रही है। कभी कल कल बहते पानी में यहां नाव से लोग नदी पार करते थे और आज नदी के बीचों बीच लोग मोटर साइकलों की दौड़ लगा रहे हैं।
आपको बता दें कि उत्तराखंड के कालागढ़ से रामगंगा नदी में पानी छोड़ा जाता है और करीब पश्चिम यूपी के आधा दर्जन भी से अधिक जिलों में रामगंगा नदी के पानी से सिंचाई होती है। लेकिन आज हालत ये हैं कि खुद नदी का हलक भी सूख चूका है तो खेतों तक पानी कहां से जाए। खुद रामगंगा भी आज हमसे ये सवाल पूछ रही है कि पौराणिक काल में भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाकर उद्धार किया था। तो क्या कलयुग में भी कोई भगीरथ अब इस रामगंगा को बचाने नहीं आएगा। हर कोई इस समस्या पर अपनी चिंता जाहिर करता है लेकिन उस चिंता पर मनन नहीं हो पा रहा है। शायद यही वजह है कि जब पर्यावरण अपनापन भूल जाता है तब मानव दिक्कत में पड़ जाते हैं।
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विश्व पर्यावरण दिवस पर देशभर में तमाम जगहों पर बड़े-बड़े शिक्षाविदों और पर्यावरण वैज्ञानिकों द्वारा एसी हॉलों में बैठकर संगोष्ठी और सेमिनार का आयोजन किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत देखने वाला कोई नजर नहीं आया। हम यहां बात कर रहे हैं मुरादाबाद की जीवनदायनी रामगंगा नदी की, जो लंबे समय से अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, लेकिन इसकी सुध किसी ने नहीं ली।
उत्तराखंड के कालागढ़ से लेकर बिजनौर मुरादाबाद रामपुर बरेली और बदाऊं होते हुए रामगंगा फरुखाबाद में जाकर गंगा नदी में मिल जाती है। जबकि आज मुरादाबाद तक पहुंचने में ही रामगंगा हांफने लगती है। मुरादाबाद के रामगंगा नदी में जो थोड़ा पानी बह रहा है वो भी गंदे नालों और फैक्ट्रियों से निकलने वाला पानी है। जिस कारण नदी कि वनस्पति ही नहीं जलीय जीव भी अब नष्ट हो चले हैं, या यूं कह सकते हैं कि बस नाम बाकि है और कुछ नहीं।
रामगंगा नदी को करीब से जाकर देखा तो नदी फूट-फूट कर रोती हुई दिखाई दे रही है। कभी कल कल बहते पानी में यहां नाव से लोग नदी पार करते थे और आज नदी के बीचों बीच लोग मोटर साइकलों की दौड़ लगा रहे हैं।
आपको बता दें कि उत्तराखंड के कालागढ़ से रामगंगा नदी में पानी छोड़ा जाता है और करीब पश्चिम यूपी के आधा दर्जन भी से अधिक जिलों में रामगंगा नदी के पानी से सिंचाई होती है। लेकिन आज हालत ये हैं कि खुद नदी का हलक भी सूख चूका है तो खेतों तक पानी कहां से जाए। खुद रामगंगा भी आज हमसे ये सवाल पूछ रही है कि पौराणिक काल में भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाकर उद्धार किया था। तो क्या कलयुग में भी कोई भगीरथ अब इस रामगंगा को बचाने नहीं आएगा। हर कोई इस समस्या पर अपनी चिंता जाहिर करता है लेकिन उस चिंता पर मनन नहीं हो पा रहा है। शायद यही वजह है कि जब पर्यावरण अपनापन भूल जाता है तब मानव दिक्कत में पड़ जाते हैं।
