पत्नी की मौत के बाद दहेज हत्या के झूठे आरोप मे 31 माह तक जेल मे रहे उमेश, उसके पिता भीमसेन व माँ फूलवती को अब अदालत ने सबूतो के अभाव और अभियोजन पक्ष की विफलताओ के चलते दोषमुक्त करार दिया है। सलाखो के पीछे 31 माह गुजार कर आये उमेश ने कहा कि इन तीन वर्षों में उसने जो खोया है, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
पाठको को बताना उचित होगा कि जून 2023 में बरखेड़ा थाना क्षेत्र के गांव जिरौनियां निवासी पुष्पा देवी की संदिग्ध परिस्थितियों में जहर खाने से मौत हो गई थी। इस मामले मे पुष्पा के भाई सुनील कुमार, निवासी बरेली ने बहन के पति उमेश, ससुर भीमसेन उर्फ अनोखेलाल और सास फूलवती के खिलाफ दहेज के लिए जहर देकर हत्या करने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने मामले में तत्परता दिखाते हुए तीनों को जेल भेज दिया था।
मामले की सुनवाई के दौरान एडीजे (पंचम) छांगुर राम ने सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी घटना में 'सत्य का अंश' होना और 'वही सत्य होना', इन दोनों के बीच एक लंबा अंतराल होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लम्बी अदालती कार्रवाई के बाद भी अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि आरोपियों ने कभी दहेज की मांग की थी। इसके साथ ही महिला को जहर देकर हत्या किये जाने वाले दावों को पुख्ता करने के लिए भी कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके है। दूसरी ओर बचाव पक्ष ने दलील दी कि शादी के एक साल बाद भी बच्चा न होने के कारण पुष्पा अवसाद में थी, जिससे आत्महत्या की संभावना को बल मिला।
जेल से बाहर आए उमेश की आंखों में आंसू और भविष्य की चिंता साफ दिखी। उमेश ने बताया कि माता-पिता और उसके जेल में रहने के चलते घर पूरी तरह बिखर गया है। जेल जाने के बाद उसके नाबालिग भाई की पढ़ाई छूट गई और बहन की शादी रुक गई। इतना ही नही मुकदमे के खर्च और घर चलाने के लिए चार बीघा खेत और घर के जेवर गिरवी रख दिए गए। उमेश को हार्निया की गंभीर बीमारी है, लेकिन आज उसके पास इलाज कराने तक के पैसे नहीं बचे हैं।
उमेश के माता पिता तीन-तीन महीने जेल काटकर पहले ही जमानत पर बाहर आ गए थे, लेकिन उमेश को दोषमुक्त होने के लिए 31 महीने का लंबा इंतजार करना पड़ा। यह मामला एक बार फिर उन कानूनी पेचीदगियों की ओर इशारा करता है जहाँ एक निर्दोष को अपनी बेगुनाही साबित करने में जीवन का बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ता है। एडीजे छांगुर राम ने अपने फैसले मे साफ कहा कि अभियोजन पक्ष महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित करने या जहर देने की बात साबित नहीं कर सका। संदेह का लाभ अभियुक्तों को दिया जाना न्यायसंगत है।
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