जिला संभल का चंदौसी नगर गणेश चतुर्थी के अवसर पर आज सोमवार को भक्ति, आस्था और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर नजर आया। सीता रोड स्थित गणेश मंदिर में आज सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी थी और दोपहर तक यह भीड़ विशाल जनसैलाब मे बदल गई। जैसे-जैसे गणेशरथ यात्रा आगे बढ़ी, नगर की सड़कों से लेकर मकानों की छतों तक लोगों का हुजूम दिखाई दिया।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर निकाली जाने वाली विशाल रथ यात्रा का उद्घाटन केंद्रीय राज्यमंत्री बीएल वर्मा ने फीता काटकर किया। इससे पूर्व राज्यमंत्री गुलाब देवी ने गणेश मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भगवान गणेश का आशीर्वाद लिया। उद्घाटन के बाद नगाड़ों और बैंड की गूंज के बीच शोभायात्रा शुरू होने पूरा नगर गणपति बप्पा के जयकारों से गूंज उठा। गणेश शोभायात्रा मंदिर से प्रारंभ होकर नगर के विभिन्न प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए करीब चार किलोमीटर की दूरी तय कर देर रात मंदिर पहुंचकर शोभायात्रा ने विश्राम किया। यहां पर भाजपा जिलाध्यक्ष हरेंद्र सिंह, पालिकाध्यक्ष लता वार्ष्णेय राजेश शंकर राजू, परमेश्वरी लाल सैनी समेत मेला कमेटी के हरिगोपाल, ललित किशोर, मनोज गुप्ता, रवीद्र रूपी, डाॅ. राजीव गुप्ता, सतेंद्र मामा, शुभम अग्रवाल आदि मौजूद रहे। रास्ते में हजारों श्रद्धालु सड़कों के दोनों ओर खड़े रहे। कई स्थानों पर घरों की छतों से श्रद्धालुओं ने झांकियों और गणेश रथ पर पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।
महाप्रभु गणेश का दिव्य रथ रथ यात्रा का प्रमुख आकर्षण रहा। इस रथ मे सवार भगवान गणेश के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में होड़ दिखाई दी। इस दौरान ढोल-नगाड़ों और बैंड की धुन पर युवा और महिलाएं जमकर झूमते नजर आए। शोभायात्रा में शामिल रही भगवान गणेश, नंदी पर विराजित गजानन, हनुमान जी, महाकाली, कालरात्रि, कुबेर, भगवान राम, वराह अवतार और जगन्नाथ जी समेत कई धार्मिक झांकियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। आधुनिक तकनीक और कलात्मक कौशल से तैयार ये स्वचालित झांकिया पूरी तरह सजीव प्रतीत हो रही थी। कहीं भगवान गणेश हाथ उठाकर आशीर्वाद देते दिखाई दिए तो कहीं डमरू वादन और नृत्य मुद्राओं ने लोगों को आकर्षित किया। धार्मिक झांकियों के साथ देशभक्ति पर आधारित झांकी ने भी लोगों में राष्ट्रप्रेम का भाव जगाया।
रथयात्रा मे धार्मिक आस्था के साथ देश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं व देश भक्ति की झलक भी देखने को मिली। राजस्थान के बौना-बौनी कलाकार, केरल के कोच्चिपुरी ढोल और पंजाब के भांगड़ा दल ने लोगों को खूब आकर्षित किया। इसी के साथ दिल्ली, मेरठ, बरेली, हापुड़ और जेवर से आए बैंड दलों ने भक्ति गीतों की धुनों से माहौल को और भक्तिमय बना दिया। मेरठ के 15 सदस्यीय लेडीज बैंड की प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। महाराष्ट्र बैंड और चंदौसी के स्थानीय ढोल की गूंज पर देर तक श्रद्धालु थिरकते रहे। वहीं गोरिल्ला, गुड्डा और लंबू जैसे मुखौटा कलाकारों ने बच्चों का मनोरंजन किया।
रथयात्रा की कुछ झांकियों में कलात्मक प्रयोग भी देखने को मिले। ग्लेज्ड पेपर, कटर, पेंसिल, मार्कर और कलर पेन आदि से तैयार की गई हनुमान जी की झांकी पर 'स्कूल चलो अभियान' का संदेश दिखाई दिया। झांकी तैयार करने वाले अक्षय के अनुसार इसे बनाने में करीब 60 हजार रुपये की सामग्री का इस्तेमाल किया गया। वहीं धन के देवता कुबेर की झांकी को 10 और 20 रुपये के सिक्कों से सजाया गया था। महाप्रभु गणेश की झांकी में करीब 35 हजार मोरपंखी स्टोन, 10 हजार रंग-बिरंगे स्टोन और पांच हजार शीशे की कटिंग का इस्तेमाल किया गया।
चंदौसी की गणेश महोत्सव परंपरा में महाकाय बूंदी मोदक भी खास आकर्षण रहा। मुस्लिम समुदाय द्वारा गणपति बप्पा के भोग हेतु समर्पित किया गया करीब दो कुंतल वजन का यह मोदक विकासनगर में तैयार किया गया और यात्रा के रूप में गणेश मंदिर तक लाया गया। इस परंपरा की सबसे खास बात सामाजिक सद्भाव का संदेश है। वर्ष 2000 से चली आ रही इस परंपरा में मुस्लिम समाज के लोग भी लगातार सहयोग करते आ रहे हैं। लक्ष्मनगंज निवासी इश्त्याक बेग के मुताबिक यह भोग कभी पांच कुंतल से शुरू हुआ था, जो अब करीब दो कुंतल का रह गया है, लेकिन इसके पीछे की आस्था आज भी कायम है। फहीम, मतीन, नदीम और इंतजार समेत कई लोग इस आयोजन में सहभागिता करते हैं।
चंदौसी के गणेश महोत्सव की एक अनूठी परंपरा यह भी है कि शहर के सौ से अधिक पंडालों और विभिन्न घरों में स्थापित की जाने वाली छोटी गणेश प्रतिमाओं को पहले मुख्य गणेश मंदिर लाया जाता है। मेला सहयोगी सतेंद्र मामा के अनुसार मंदिर में स्थापित मुख्य गणेश प्रतिमा के नयनों से नई प्रतिमाओं के नयन मिलाए जाते हैं। श्रद्धालु इसे भगवान गणेश की चैतन्य ऊर्जा और आशीर्वाद प्राप्त करने की पवित्र परंपरा मानते हैं। इसके बाद बैंड-बाजे और जयकारों के साथ श्रद्धालु गणेश प्रतिमाओं को अपने घरों और पंडालों में ले जाकर स्थापित करते हैं।
चंदौसी की यह शोभायात्रा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, कला, संस्कृति और सामाजिक सद्भाव का ऐसा संगम बनी, जिसने पूरे नगर को एक ही रंग में रंग दिया—गणपति बप्पा के रंग में।


